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Auraiya : सुभानपुर में धूमधाम से मनाया गया मकर संक्रांति पर्व, सैकड़ों श्रद्धालुओं को वितरित की गई खिचड़ी


सामाजिक जागरूकता शिक्षा सुरक्षा जनकल्याण फाउंडेशन एवं सुभानपुर मेला कमेटी का सराहनीय आयोजन

अछल्दा (संवाददाता)। ग्राम सुभानपुर में मकर संक्रांति का पावन पर्व सामाजिक जागरूकता शिक्षा सुरक्षा जनकल्याण फाउंडेशन एवं सुभानपुर मेला कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में पूरे श्रद्धा, उल्लास और सामाजिक सौहार्द के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बाबा पांडरी एवं माता काली के प्राचीन मंदिर परिसर में भव्य आयोजन किया गया, जहाँ सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंदिर के पुजारी संतराम एवं सत्यनारायण द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना के साथ कराया गया। पूजा उपरांत सैकड़ों श्रद्धालुओं को प्रसाद एवं खिचड़ी का वितरण किया गया। आयोजन स्थल पर डीजे की धुनों पर युवक-युवतियों ने उत्साहपूर्वक नृत्य कर पर्व की खुशियाँ मनाईं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण हो उठा।
खिचड़ी वितरण एवं सेवा कार्य में दयानन्द, मिलाप सिंह यादव, सतेंद्र यादव, अरविन्द कुमार,  गोविन्द नारायण, अभिनेत्र प्रताप, विपन कुमार, उमेश कुमार, नबाब सिंह, देवेन्द्र कुमार, योगेश कुमार, वेदप्रकाश, जगदीश कुमार, प्रबल प्रताप, अनिल कुमार,  जितेश यादव, कुलदीप यादव,  राम सिंह, दिलासाराम, वीरेंद्र कुमार, अबनेस यादव, प्रदीप कुमार,  सहित अनेक श्रद्धालु एवं कार्यकर्ता सुबह से ही सक्रिय रूप से लगे रहे। सभी ने सेवा भाव से आने वाले श्रद्धालुओं की व्यवस्था संभाली, जिसकी क्षेत्र में सराहना की जा रही है।
इस अवसर पर समाजसेवी डॉ. रविन्द्र कुमार एवं श्रीमती विनीता चौधरी, इशू प्रताप ने वहाँ कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह को मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ देते हुए यह कहा कि यह पर्व सामाजिक समरसता, सेवा और आपसी भाईचारे का संदेश देता है। उन्होंने जानकारी दी कि *सुभानपुर मेला वर्ष 2026 में 10 मार्च से 15 मार्च तक आयोजित किया जाएगा, जिसमें 13 मार्च को एक विशाल कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन होगा।* इस कुश्ती में देश–विदेश से नामी पहलवानों के भाग लेने की संभावना है जिसमें भारत के करीब पंद्रह प्रदेश व नेपाल और भूटान के पहलवान आने की सम्भावना है, जिसके लिए तैयारियाँ तेज़ कर दी गई हैं।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी श्रद्धालुओं, सहयोगकर्ताओं एवं ग्रामवासियों का आभार व्यक्त किया। मकर संक्रांति का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक सेवा और एकता का भी सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता नजर आया।

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